Author: UK Atheya

कुत्ते में डिस्टैम्पर रोग (Distemper)
यह एक छूत वाली विषाणु द्वारा फैलने वाली भयंकर रोग है। इसका विषाणु आदमी में होने वाले खसरे के विषाणु से मिलता है। यह कुत्तों के बच्चों का भंयकर रोग है। तथा यह बिना टीकाकरण करायें हुए दूसरे कुत्तों को भी लग सकता है। यह पेट तथा फेफड़ों को लगने वाला रोग है। यह कभी-…
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कुत्तों में लगाये जाने वाले टीके
आजकल नॉन एडजूवेन्ट वैक्सीन (अर्थात जीवाणुओं के साथ मिनरल ऑयल मिला दिया जाता है जिससे प्रतिरोधक क्षमता तेजी से विकसित होती है) का अधिक प्रयोग होता है। क्योंकि एडजूवेन्ट वैक्सीन से रियक्सन हो जाते है।
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टीकाकरण का इतिहास
इंग्लैण्ड के डॉक्टर जीनर ने सन् 1896 में यह देखा कि जब गायों में माता का रोग होता है तथा जो ग्वालिन उनके दूध निकालने से उनके हाथों में हल्के छाले हो जाते है। तथा इन ग्वालिनो को आदमी में होने वाला पोक्स का भयंकर रोग नही लगता है।
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कुत्ता पालने का शौंक एवं सावधानियाँ
कुत्तों के सौन्दर्य प्रसाधन एवं ईलाज के लिए काफी चिकित्सालय खुलते जा रहे है। जहां कि टीकाकरण एवं वाहृ एवं आंत्रिक परजीवियों, एलर्जी, खाल के रोग आदि का उपचार कराना आवश्यक है क्योंकि यह रोग वुफत्तें से मनुष्य में पैफल जाते है और इससे मनुष्य के जीवन को भी खतरा हो सकता है। जैसे…
read moreमुर्गी पालन के विषय में सामान्यतः पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. कडकनाथ मुर्गी रखने के लाभ क्या है? उत्तर: इस मुर्गी को रोग बहुत कम लगते है। प्रश्न 2. यह मुर्गी 1 वर्ष में कितने अंडे देती है? उत्तर यह मुर्गी 1 वर्ष में 150 अंडे देती है जबकि फार्म की मुर्गी 300 अंडे देती है। प्रश्न 3 इस मुर्गी को उत्तराखण्ड में कहां…
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संधारणीय (Sustainable) कृषि में केंचुओं का योगदान
यद्यपि केंचुआ लंबे समय से किसान का अभिन्न मित्रा हलवाहा (Ploughman) के रूप में जाना जाता रहा है। सामान्यतः केंचुए की महत्ता भूमि को खाकर उलट-पुलट कर देने के रूप में जानी जाती है जिससे कृषि भूमि की उर्वरता बनी रहती है।
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वर्मिंग कम्पोज (केंचुओं की खाद)
हम सभी अच्छी तरह जानते हैं कि भूमि में पाये जाने वाले केंचुए मनुष्य के लिए बहुपयोगी होते हैं। मनुष्य के लिए इनका महत्व सर्वप्रथम सन् 1881 में विश्व विख्यात जीव वैज्ञानिक चाल्र्स डार्विन ने अपने 40 वर्षों के अध्ययन के बाद बताया। इसके बाद हुए अध्ययनों से केंचुओं की उपयोगिता उससे भी अधिक साबित…
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कुइल या बटेर का आवास
यह पिंजरें में पाली जाती है। इनको धान के छिलको के ऊपर भी रखा जा सकता है। इनके लिए हवा का प्रवाह बहुत आवश्यक है।
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कुइल फार्मिंग या बटेर पालन
यह 150 ग्राम से 200 ग्राम के वजन वाली चिडिया है। 2. इसका अंडा 7 से 15 ग्राम का होता है। यह 2 माह की उम्र में ही अंडा देना शुरु कर देती है। यह पहले वर्ष में 300 अंडे देती है। इसके अंडे डायबीटीज और ब्लड़ प्रेशर में लाभकारी होते है। इसके मांस से…
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बत्तक पालन के लाभ
इनको किसी विशेष आवास की आवश्यकता नही होती है। यह मुर्गी से 40 से 50 अंडे अधिक देती है। बत्तक का अंडा मुर्गी के अंडे की तुलना में 15 से 20 ग्राम अधिक होता है। बत्तक के बच्चों का पालन-पोषण मुर्गी के बच्चों की तुलना में आसान है क्योंकि इनमें रोग कम लगते है। बत्तक…
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